उन्हें तो अब हो गई आदत

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पीयूष पांडे
वो फिर लौट आई। उसी तामझाम, उसी कातिल अंदाज के साथ। उन्हीं सुर्खियों के साथ। जी नहीं, ये किसी फिल्मी तारिका की बॉलीवुड में पुनर्वापसी का जिक्र नहीं है। मुंबई की भारी बारिश का जिक्र है, जो त्योहारों की तरह हर बरस आती ही है। एक अखबारी मित्र से पूछा-मुंबई में भयंकर बारिश होती है। तुम लोग सही वक्त पर दफ्तर नहीं पहुंच पाते होंगे तो दिक्कत होती होगी? उसने बेहयाई से जवाब दिया-काहे की दिक्कत। जिस दिन कुछ ज्यादा ही विलंब होता है तो पिछले साल की हेडलाइन और खबर निकालकर चिपका देते हैं। कुछ भी तो नहीं बदलता। उन्हीं इलाकों में फिर पानी भरता है, जिनमें पिछले दस साल से भर रहा है। बीएमसी उसी तरह नकारा है, जैसी दस साल पहले थी। बीएमसी चलाने वाली शिवसेना के नेताओं पर विरोधी उसी तरह भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हैं, जैसे पहले लगाते थे। नालों की सफाई, बिल्डिंग धंसना, समुद्र में हाईटाइड में हालात और बिगडऩा जैसी सुर्खियां उसी तरह आती हैं, जैसी 10 साल पहले आती थीं। हम उन्हीं सुर्खियों और खबरों को री-जनरेट कर देते हैं। मुंबई से बाहर बैठकर हम उसी तरह आश्चर्यचकित हैं, जैसे इटली की टीम वर्ल्ड कप से बाहर बैठकर है। इटली को वर्ल्ड कप से अब कोई लेना-देना नहीं लेकिन पूरा देश वर्ल्ड कप देख रहा है। हमें भी फिलहाल मुंबई से कोई लेना-देना नहीं लेकिन टीवी चैनल मुंबई की बारिश दिखा रहे हैं तो लग रहा है कि मुंबई के हालात जानने-समझने चाहिए। एक दोस्त को फोन लगाया और पूछा-भाई, ये बीएमसी अधिकारी क्या अंधे हैं। उन्हें दिखता क्यों नहीं कि हर साल बारिश में हालात कितने बिगड़ जाते हैं? दोस्त ने दार्शनिक अंदाज में सांस ली और बोला-नजरिए का फर्क है। बीएमसी अधिकारी जब मुआयने पर निकलते हैं तो मुंबई की सड़कों पर नाव चलती देख उन्हें अपनी उपलब्धि पर फख्र होता है कि देखिए हमने मुंबई को वेनिस बना दिया। जिस काम को बड़े-बड़े राजनेता करने का ख्वाब नहीं देख पाए, उन्होंने थोड़े से कारनामे से कर दिखाया। एक नजरिया ये भी है कि मुंबईवासी सालभर पानी की किल्लत का रोना रोते हैं। बारिश में हर तरफ जल ही जल देखकर उन्हें पानी से विरक्ति हो जाती है। एक रिश्तेदार को फोन लगाया और पूछा कि बच्चों के स्कूल का क्या होता है। वे बोले-होना क्या है। छुट्टी हो लेती है। बच्चे मौज करते हैं।
अब समझ में आया कि न्यूज चैनलों के चक्कर में मुंबई की भारी बारिश का मुंबई से बाहर बैठे लोग ही कुछ ज्यादा तनाव लेते हैं। बाकी सबको आदत हो गई है।