उम्मीदवारों के दमखम पर टिका मुकाबला

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गिरिजा शंकर
उत्तर प्रदेश के उपचुनावों में हुए सपा, बसपा, कांग्रेस गठबंधन के परिप्रेक्ष्य में मध्य प्रदेश में अगले माह होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस-बसपा गठबंधन के आसार को मायावती ने ध्वस्त कर दिया। बसपा सुप्रीमो मायावती ने कांग्रेस के साथ कोई गठबंधन न करने का ऐलान करते हुए कांग्रेस पर क्षेत्रीय पार्टियों को खत्म करने का आरोप लगा दिया। सोनिया गांधी व राहुल गांधी पर विश्वास जताते हुए उन्होंने दिग्विजय सिंह को भाजपा का एजेंट भी बता दिया। मायावती के इस इनकार के साथ मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में नया मोड़ आते-आते रुक गया और अब इस चुनाव का परिदृश्य भी वैसा ही रहेगा जैसा पिछले चुनावों में रहा है। 1972 के विधानसभा चुनाव से मध्य प्रदेश में दो दलीय चुनावी राजनीति रही है। कांग्रेस व भाजपा के बीच ही मुकाबला होता रहा है। 1990 में दो सीटों पर जीत के साथ बसपा का प्रवेश प्रदेश की राजनीति में हुआ। 1996 में 2 लोकसभा सीटों तथा 1998 में 11 विधानसभा सीटों पर जीत के बाद ऐसा लगा कि बसपा प्रदेश की चुनावी राजनीति में तीसरी शक्ति के रूप में उभरेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ और लगभग तीन दर्जन सीटों पर 20 फीसदी से अधिक वोट लेने के बाद भी सीटों के मामले में बसपा फिसड्डी रही। 2018 के विधानसभा चुनाव में लगातार 15 साल सरकार में रहने वाली एंटी इंकम्बेंसी से पार पाते हुए चौथी बार सरकार बनाने की कोशिश में जुटी भाजपा नहीं चाहती थी कि बसपा-कांग्रेस के बीच गठबंधन हो। इधर कांग्रेसी नेता गठबंधन के प्रति अति आत्मविश्वास में थे। इस दिशा में भाजपा कुछ कर नहीं सकती थी और कांग्रेस कुछ कर नहीं रही थी। अब तक का अनुभव है कि त्रिकोणीय संघर्ष में चुनावी लाभ भाजपा को अधिक होता है। इस चुनाव में कोई लहर नहीं है, कोई मुद्दा नहीं है। भाजपा के पास सरकार की उपलब्धियों का बखान है तो कांग्रेस के पास सरकार पर आरोप। अलबत्ता कांग्रेस ने राहुल गांधी को शिव भक्त व राम भक्त के रूप में पेश कर गौशाला और रामगमन पथ बनाने का ऐलान जरूर किया है। एससी, एसटी एक्ट के परिप्रेक्ष्य में सपाक्स और अजाक्स के रूप में सामान्य वर्ग व आरक्षित वर्ग भी चुनाव में सक्रिय हो गये हैं। आम मतदाताओं में बदलाव की चाहत दिखती है लेकिन कांग्रेस उसको भुनाने को तैयार नजर नहीं आती। ठीक ऐसा ही माहौल 1998 के विधानसभा चुनाव में था जब कांग्रेस के दिग्विजय सिंह की सरकार दुबारा सत्ता में लौट आई थी। भाजपा के पास मुख्यमंत्री शिवराज ही अकेले खेवैया हैं जो आज भी अपनी लोकप्रियता कायम किये हुए हैं। पिछले दो-तीन महीने से वे रात के 3-4 बजे तक प्रदेश के कोने-कोने में जन आशीर्वाद यात्रा निकाल रहे हैं। वे यह समझ रहे हैं कि भाजपा को चौथी बार जीत दिलाना आसान नहीं है। राज्य व केन्द्र में एक ही पार्टी की सरकार होने से फायदा कम, नुकसान अधिक होता है। उसके खिलाफ चुनाव में दुहरी एंटी इंकम्बेंसी होती है। 15 साल तक सरकार में होने के कारण पार्टी संगठन पूरी तौर पर सरकार खासकर मुख्यमंत्री पर आश्रित हो चला है। भाजपा के पूर्व अध्यक्ष नंदकुमार चौहान सार्वजनिक रूप से यह स्वीकारते रहे हैं कि भाजपा का पूरा तम्बू एक बम्बू (शिवराज सिंह) पर टिका है। इधर कांग्रेस ने कमलनाथ को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर नई रणनीति चली है। कांग्रेस की दिक्कत गुटबाजी से अधिक फर्स्ट एमांग इक्वल की रही है। कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिग्विजय सिंह ऐसे नेता रहे हैं जो हमेशा अपने आपको प्रदेश अध्यक्ष से ऊपर मानकर चलते रहे। कमलनाथ की वरिष्ठता के चलते कांग्रेस इस दिक्कत से उबर तो गई है लेकिन यह फैसला इतनी देर से हुआ कि कांग्रेस के समक्ष समय का संकट बना हुआ है।  बिना किसी लहर के चुनाव में प्रत्याशी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और इस विधानसभा चुनाव में ऐसा ही होता दिख रहा है। चुनाव परिणाम बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि विभिन्न दलों के प्रत्याशी कौन से हैं। यह भी सच्चाई है कि दोनों दलों के पास सभी 230 सीटों पर अपने दम से जीतने वाले प्रत्याशियों का अभाव है। ऐसे में उस दल का चुनाव में पलड़ा भारी होगा, जिसके पास जिताऊ उम्मीदवार अधिक होंगे। चुनाव परिणाम जो भी हों लेकिन भाजपा व कांग्रेस दोनों कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। कांग्रेस हर हाल में सत्ता में वापसी करने में लगी है, अपनी छवि हिन्दुत्ववादी बनाने की सीमा तक जाकर और भाजपा भी हर हाल में चौथी बार सत्ता में आने के लिये जी जान से लगी है, सरकारी खजाने को दिल खोलकर लुटाते हुए। अभी टक्कर कांटे की लग रही है लेकिन चुनाव आते-आते तस्वीर बदल भी सकती है। सही तस्वीर उम्मीदवार घोषित होने के बाद स्पष्ट हो सकेगी।