कृष्ण तुम्हारा पांचजन्य कब बोलेगा

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बोलो ईश्वर बोलो अल्लाह मौन तुम्हारा कब टूटेगा
कब तक यह इंसान दरिंदा बन कर अस्मत को लूटेगा
कब तक आसिफा और दामिनी बोलो पीड़ा झेलेगी
कब तक दिव्या और संस्क्रति जीवन से नाता तोड़ेगी
जब तक आसिम जंगोत्रा से लोग यहां पर ज़िंदा है
मेरी छोड़ो देखो मन्दिर मस्जिद भी शर्मिंदा है
     पंचाली की चीखों से कब कान्हा जी संयम डोलेगा
      पूंछ रही हूँ कृष्ण तुम्हारा पांचजन्य कब बोलेगा
सारे आलम की रहमतश्रद्धा से शीश नवाया था
सुनते है कि ज़मीदोज़ होने से हमे बचाया था
आसिम  इम्रा जैसो को धरती पर ना आने देते
या फिर हमको बचपन मे ज़िंदा ही तुम मरने देते
         बोलो आज नबी जी कब इंसाफ तुम्हारा बोलेगा
          ऐसे शैतानों पर रब का कहर कहो कब टूटेगा
आज नही आंखों में आंसू अब तो बस अंगारे है
आहत मन्दिर शर्मिंदा सी मस्जिद की मीनारे है
टूट गया विश्वास हमारा तुम रक्षा को आओगे
इस ज़ालिम दुनियां में हमको तुम इंसाफ दिलाओगे
        लेगे अब कानून हाथ मे न्याय हमारा बोलेगा
         ज़िंदा फूकेंगे ज़ालिम को देश यह सारा देखेगा
                                               शबिस्ता ‘बृजेष’