मिर्चपुर का न्याय : सबक भी सीखें सरकार और समाज

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किसी भी सभ्य एवं कानून सम्मत समाज को शर्मसार करने वाले मिर्चपुर कांड के 12 आरोपियों को दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा उम्रकैद की सजा पर संतोष जताया जा सकता है, लेकिन सामाजिक सौहार्द का असल सवाल अनुत्तरित ही है। भूपेंद्र सिंह हुड्डा के मुख्यमंत्रित्वकाल में अप्रैल, 2010 में हुए मिर्चपुर कांड में एक 70 वर्षीय दलित और उसकी बेटी को जिंदा जला दिया गया था। उसके अलावा भी लगभग दो दर्जन दलितों के घर जला दिये जाने का आरोप भी जाट समुदाय के लोगों पर लगा था। देश की राजधानी दिल्ली से सटे हरियाणा में ऐसे दिल दहला देने वाले कांड पर जमकर राजनीति भी हुई। हरियाणा कांग्रेस के दलित नेताओं ने हुड्डा को घेरा तो विपक्षी दलों ने कांग्रेस पर निशाना साधा। राजनीति से इतर देखें तो यह पूरे देश-समाज को ही शर्मसार कर देने वाली घटना थी। मिर्चपुर गांव में तब के माहौल का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 254 दलित परिवारों को पलायन करना पड़ा था। बेशक घटना के बाद सरकार हरकत में आयी और उसने कड़े कदम उठाने का दावा भी किया, लेकिन दलितों के अविश्वास का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उन्हें हरियाणा में निष्पक्ष सुनवाई तक का भरोसा नहीं था। नतीजतन सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर मिर्चपुर कांड की पहले दिल्ली की एक निचली अदालत में सुनवाई हुई और फिर दिल्ली उच्च न्यायालय में।
निचली अदालत ने तीन आरोपियों को ही उम्रकैद की सजा सुनायी थी, लेकिन अब दिल्ली उच्च न्यायालय ने 12 आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनायी है। यह तभी संभव हो पाया, जब निचली अदालत के आदेश के विरुद्ध पीडि़त पक्ष उच्च न्यायालय में गया। उच्च न्यायालय ने कुल 33 आरोपियों को सजा सुनाते हुए हरियाणा सरकार को प्रभावित दलितों को पुन: बसाने के आदेश भी दिये हैं। निश्चय ही इससे प्रभावित परिवारों की उस पीड़ा की भरपाई नहीं हो सकती, जो उन्होंने पिछले आठ सालों में भोगी है, लेकिन इस बात पर संतोष जताया जा सकता है कि अंतत: न्याय हुआ है। फिर भी जैसी कि खुद उच्च न्यायालय ने भी टिप्पणी की है, आजादी के 70 साल बाद भी दलितों के साथ इस तरह की घटना बेहद शर्मनाक है। मिर्चपुर कांड की जांच के लिए गठित एक सदस्यीय न्यायमूर्ति इकबाल सिंह आयोग ने इस घटना के लिए मूकदर्शक बनी रही पुलिस को जिम्मेदार ठहराया था। बेशक ऐसी घटनाओं के लिए पुलिस-प्रशासन अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही से नहीं बच सकता, लेकिन ऐसी घटनाएं राजनीतिक-सामाजिक नेतृत्व की नाकामी का भी परिणाम हैं। इसलिए सरकार और समाज, दोनों को ही मिलकर ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकनी होगी।