रिश्तों के नये रास्ते : सामरिक दृष्टि से अमेरिका के करीब भारत

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भारत और अमेरिका के रक्षा व विदेश मंत्रियों के टू प्लस टू सम्मेलन के निष्कर्ष को इस मायने में महत्वपूर्ण कहा जा सकता है कि इससे दोनों देशों के सामरिक रिश्तों में नजदीकी आएगी। दोनों देशों में कई द्विपक्षीय मुद्दों के अलावा कई ऐसे विषयों पर सहमति बनी जो वर्षों से लटके हुए थे। इनमें व्यापार, सुरक्षा और आतंकवाद जैसे मुद्दे भी शामिल हैं। सबसे महत्वपूर्ण कोमकासा समझौता यानी कम्यूनिकेशंस कम्पैटिबिलिटी एंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट है जो दोनों देशों की सेनाओं के बीच संचार एवं समन्वय को बढ़ाएगा। इस समझौते को दोनों देशों के संबंधों में नया आयाम बताया जा रहा है। बकौल रक्षामंत्री इससे भारत की रक्षा क्षमता बढ़ेगी। दरअसल, इस समझौते को अमेरिका आधारभूत समझौतों की श्रेणी में मानता रहा है जबकि भारत की इसको लेकर कुछ शंकाएं थीं। इससे पहले भारत लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरंडम ऑफ एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर कर चुका है। निश्चित रूप से इससे भारत और अमेरिका के समारिक व कूटनीतिक रिश्तों में करीबी आएगी। बताया जाता है कि दोनों मंत्रियों की उपस्थिति में अमेरिका ने भारत की एनएसजी की सदस्यता को पूर्ण समर्थन देने और इस दिशा में यथाशक्ति से प्रयास करने का वायदा भी किया है। मगर असली सवाल यह है कि आतंकवाद के मुद्दे पर अमेरिका ने पाक पर दबाव बनाने पर क्या आश्वासन दिया। यहां उल्लेखनीय है कि अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो पाकिस्तान होते हुए आए हैं और हाल ही में अमेरिका ने पाकिस्तान को दी जाने वाली मदद पर रोक लगाई है। इसमें दो राय नहीं कि पिछले कुछ समय में अमेरिका ने पाकिस्तान में चरमपंथियों के खिलाफ भारत के पक्ष में दबाव बनाया है। अब असली सवाल यही है कि रूस से होने वाले भारत के रक्षा समझौतों को लेकर क्या अमेरिका कुछ उदार होगा दूसरा मुद्दा है कि क्या ईरान से कच्चा तेल लेने पर अमेरिका द्वारा घोषित आर्थिक प्रतिबंधों से भारत को कुछ राहत मिलेगी यह भी कि भारत और ईरान के रिश्ते किस सीमा तक रह पायेंगे। निश्चय ही ये बेहद संवेदनशील प्रश्न हैं और सार्वजनिक रूप से कोई भी सरकार इस पर बात नहीं करेगी। इससे जुड़े मसलों का खुलासा आने वाले वक्त में हो पायेगा। बहरहाल, दोनों देशों के मंत्रियों के बीच हुए समझौतों से आस जगी है कि दोनों देशों के रिश्ते आगे की दिशा में बढ़ेंगे। विदेश और रक्षा मंत्री का भारत आना इसलिये भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका के कूटनीतिक रिश्तों का निर्धारण ये दो मंत्रालय करते रहे हैं।