संस्कारों के शहर में “संस्कृति” मर गई

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सभ्यता लज्जित हुई फिर से मानवता डर गई
संस्कारों के शहर में “संस्कृति” मर गई
माँ-पिता का ख्वाब बनकर
हौसले की आग बनकर
गांव से आई शहर वो
उन्नति का राग बनकर
गर्व से बोले पिता,बेटी मेरी मुझ पर गई
संस्कारों के शहर में संस्कृति मर गई
मन के सब एहसास लेकर
प्रेम का विश्वास लेकर
रेल बैरन जा सकी न
उसको माँ के पास लेकर
साँसों के संग-संग था जाना साँसों के बिन घर गई
संस्कारों के शहर में संस्कृति मर गई
पहले थोड़ा लड़-झगड़कर
बोली होगी उनसे अड़कर
जाने दो,जाने भी दो न
रोयी होगी पांव पड़कर
कहते-कहते आँख उसकी आँसुओ से भर गई
संस्कारों के शहर में संस्कृति मर गई
अलविदा तुमको जमाना
जालिमों को तुम बचाना
भाषणों में याद रखना
और मुझको भूल जाना
मंदिरों में मैं मिलूंगी व्यंग्य हमपर कर गई
संस्कारों के शहर में संस्कृति मर गई
प्रियंका राय ओमनंदिनी