सबरीमाला के बाद अब महिला पुजारी

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राजेश रामचंद्रन
सबरीमाला के फैसले को लैंगिक मुद्दे और महिलाओं के अधिकारों की जीत के रूप में देखा जा रहा है। मैं बचपन से ही सबरीमाला तीर्थ पर जाता रहा हूं, ऐसे में मैं यह कह सकता हूं कि प्रजनन कर सकने में समर्थ महिलाओं को इस तीर्थस्थल में प्रवेश की इजाजत देने के मायने इन दोनों ही से अलग हैं। याचिकाकर्ता धर्मनिष्ठ महिला भक्त नहीं हैं जो अपने धार्मिक साथियों के लिए मंदिर में प्रवेश के अधिकारों की मांग पर अयप्पा का आशीर्वाद पाने के लिए आतुर हों। वास्तव में, यह मामला मुस्लिम महिलाओं और तीन तलाक के मसले पर भाजपा के सरोकार से मिलता-जुलता है। सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म वाली महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध स्वच्छता, परंपरा और अंधविश्वास की प्राचीन-आधुनिक भावना का मिश्रण है, जिसे धार्मिक मान्यता के रूप में पेश किया गया है। केरल में अधिकांश हिंदू परिवार आमतौर पर शाम को दीया जलाते हैं और बुजुर्ग तथा बच्चे श्लोकों का पाठ करने बैठते हैं, आध्यात्मिक मलयालम कविता पढ़ते हैं या फिर भक्ति फिल्मों के गीत (यह परिवार की शिक्षा पर निर्भर करता है) गाने के आदी हैं। आमतौर पर परिवार की महिलाएं दीया जलाती हैं। लेकिन मासिक धर्म के दौरान वे ऐसा नहीं करतीं। सेनेटरी पैड्स के पहले के जमाने में शायद महिलाओं की यह सोच रही हो कि रक्तस्राव कहीं पूजा घर को गंदा न कर दे, इसलिए ऐसे समय में इस कार्य से दूर ही रहना बेहतर है। यह लड़कों और पुरुषों पर भी लागू होता है, जिन्हें स्नान के बिना कुछ भी पवित्र काम करने से वंचित किया जाता था। जाहिर है, इसी तर्क के आधार पर मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को भी मंदिरों को दूर रखना था। सबरीमाला की यात्रा के लिए घने जंगल के बीच एक लंबे दुरूह मार्ग से होकर जाना होता था। कठिनाई, उम्र और मंदिर की अप्रत्याशित चढ़ाई के साथ मंदिर के चारों ओर बौद्ध धर्म का उद्भव एवं परंपराएं भी महिलाओं को मंदिर में नहीं जाने देने की एक वजह हो सकती है। ऐसे में केवल 10 साल से कम उम्र की लड़कियां और रजोनिवृत्त हो चुकी महिलाएं ही यात्रा पर जाती थीं, हालांकि इसके बहुत सारे अपवाद भी हैं।महिलाओं को इतने लंबे समय तक मंदिर से दूर रखने के पीछे कारण चाहे जो भी रहा हो, फैसले का आस्था के मोर्चे पर न्यायिक हस्तक्षेप के रूप में स्वागत किया जाना चाहिए। किसी भी समाज को बाहरी एजेंसी के बिना खुद को सुधारना मुश्किल होता है। यहां न्यायाधीशों ने एंग्लो-सैक्सन कानून, संविधान और तर्कवाद का प्रदर्शन किया, जो शायद यह विश्वास नहीं करें लेकिन उन्होंने धार्मिक लोगों के बंद दिमाग को बलपूर्वक खोलने का निर्णय किया है। महिलाएं आज सेनेटरी नेपकिंस का प्रयोग कर रही हैं और उनकी अनेक क्षेत्रों में सक्रियता देखी जा सकती है। ऐसे में अब मासिक धर्म के दौरान उन्हें मंदिर में जाने से क्यों रोका जाना चाहिए? किसी महिला श्रद्धालु के लिए सदियों पुरानी इन धारणाओं को एक झटके में दूर कर देना बहुत मुश्किल होता है। अंधविश्वास के साथ जब डर जुड़ जाता है तो इन मान्यताओं का जबरदस्ती पालन करते चले जाने की आदत भी बन जाती है। ईश्वर का कोपभाजक बनने के डर से समाज बरसों से अज्ञानता में रहता आ रहा है। दुर्भाग्यवश, तर्कवाद प्राय: समाज के कुलीन वर्ग का ही विशेषाधिकार रहा है। गरीब-गुरबा, कमजोर व्यक्ति जिसके पास दीन-दुनिया की शर्मिंदगियों को झेलने के लिए सिर्फ और सिर्फ अंधभक्ति ही होती है, वह ईश्वर का कोपभाजक बनने का जोखिम नहीं उठा सकता। लेकिन सुप्रीमकोर्ट ने अब केरल की महिलाओं को ऐसा ही कुछ करने का अधिकार दे डाला है। और इसी मायने में यह फैसला अभूतपूर्व है। वरना सबरीमाला नहीं जाना बिना किसी रकम के विवाहिता का घर से बाहर निकालने या पत्नी के साथ मारपीट करने वाले, विवाह संस्था के भीतर बलात्कार करने वाले मर्द की चौथी पत्नी बनने अथवा संपत्ति में बराबर का हक देने से इनकार करने या निर्वाचित निकायों में प्रतिनिधित्व से इनकार कर देने या नन का बलात्कार करने जैसा कतई नहीं है। सबरीमाला न जाना भी उसी तरह से किसी श्रद्धालु की श्रद्धा का विषय रहा है जैसे इस तीर्थ पर जाना होता है। ऐसी भी कई महिलाएं हैं जो इस तीर्थ पर जाने के लिए हिस्टरेक्टमी कराने का इंतज़ाम करती है। यदि आस्था तार्किक होती तो क्या उसे आस्था कहा जा सकता है? मसलन, केरल में एक देवी मंदिर है, जिसके बारे में यह मान्यता है कि वहां देवी को मासिक होता है और मंदिर के कैलेंडर के मुताबिक उन चार से पांच दिनों में मंदिर में दर्शन नहीं किए जा सकते। हर धर्म में इस तरह की अजीबोगरीब प्रथाएं होती हैं जो किसी दूसरी संस्कृति के व्यक्ति को बाहर से देखने पर बेहद घृणास्पद लग सकती हैं। सुप्रीमकोर्ट का फैसला दरअसल, बाहरी लोगों को केरल के मंदिरों की प्रथाओं में झांकने का एक अवसर लेकर आया है। और बाहरी व्यक्ति ही किसी रिवाज को देखकर उसकी विचित्रता पर टिप्पणी कर सकता है जो कि उस समाज के भीतर रहने वाले व्यक्ति के लिए पूरी तरह से सामान्य बात होती है। अब हमें बाहरी समाज के इस प्रकार के एक समाज की भीतरी व्यवस्थाओं पर झांकने को दो मायनो में एकरूपता से देखना चाहिए। हमें हर धर्म को लैंगिक परिप्रेक्ष्य में देखना होगा और तभी हमें यह समझ में आएगा कि किस प्रकार एक शोषक पितृसत्तामक व्यवस्था सभी धार्मिक संस्थाओं पर राज कर रही है। रजस्वला महिलाओं का सबरीमाला तीर्थ पर जाना दरअसल मंदिरों, मठाधीशों, डेरों, चर्चों और मस्जिदों के स्त्री विरोधी ठेकेदारों के शोषण के सामने कुछ भी नहीं है। केरल हर मायने में प्रगतिशील राज्य रहा है। केरल को सदियों पुराने जमाने की तीन-तेरह हो चुकी परंपराओं से चिपके रहने की बजाय अब सभी मंदिरों में महिला पुजारियों की नियुक्ति कर क्रांति का शंखनाद कर देना चाहिए। इस प्रकार के सामाजिक सुधारों को लागू करने के लिए बहुसंख्यक समुदाय को पहल करनी चाहिए, तभी अल्पसंख्यकों को समाज में बदलाव लाने के उनके इरादों पर भरोसा होगा। केरल के ही एक पारंपरिक मंदिर में पहले दलित वैदिक पुजारी की नियुक्ति की गई थी। तो फिर महिला पुजारी क्यों नहीं हो सकती? भारत के सभी बड़े मंदिरों में महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण होना चाहिए। महिला पुजारियों को भी ईश्वर भक्ति से उसी तरह से जुडऩा चाहिए जैसे वे जहाज उड़ाती हैं, रॉकेट भेजती हैं और इस देश को चलाती हैं। सुप्रीमकोर्ट को अगली कार्रवाई के तौर पर दूसरे धर्मों के भीतर चल रही महिला विरोधी गतिविधियों पर भी गौर करना चाहिए, खासतौर से कैथोलिक चर्चों में क्या हो रहा है, यह देखना चाहिए। आखिर यही राज्य है जहां एक बलात्कारी पादरी को गिरफ्तार करवाने के लिए पांच ननों को पूरे पंद्रह दिनों तक धरने पर बैठना पड़ा था। याचिकाकर्ताओं ने सबरीमाला मामले में जिस तत्परता का परिचय दिया है, उसे यहां भी दोहराया जाना चाहिए था, लेकिन अफसोस कि बलात्कारी पादरी की गिरफ्तारी में तीन महीने का समय लगा और केरल के किसी मार्क्सवादी नेता को इसमें कुछ भी गलत नहीं दिखा। संघ परिवार हमेशा से ही हिंदू धर्म के खतरे में होने की दुहाई देता आया है। अब यही कुछ केरल में भी दोहराया जा रहा है जहां सबरीमाला मामले और पादरी द्वारा बलात्कार के मामले में सत्ताधिकारियों की दोहरी नीति दिखायी दे रही है। लेकिन सबरीमाला के याचिकाकर्ता इस फर्क को दूर कर राज्य में संतुलन की स्थिति कायम कर सकते हैं। वे चर्चों पर काबिज पादरियों द्वारा ननों के साथ व्यवहार में बदलाव ला सकते हैं, कन्फेशन यानी पापों की स्वीकारोक्ति के मामलों में दुरुपयोगों को रोक सकते हैं और इसी तरह से कुछ निर्लज्ज पादरियों द्वारा आस्थावान ननों को ब्लैकमेल करने तथा उनके साथ बलात्कार करने की घटनाओं में भी हस्तक्षेप कर सकते हैं। समाधान एकदम आसान है— महिलाओं की हर स्तरों पर पादरियों के रूप में नियुक्ति की जाए। याचिकाकर्ताओं को भारत में कैथलिक चर्चों में महिला पादरियों की मांग के लिए आगे आने का मौका दें।