सरकारों की नीति-नीयत पर सवाल

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अनूप भटनागर
लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाहुबलियों और आपराधिक छवि वाले संदिग्ध व्यक्तियों से मुक्त कराने के निर्वाचन आयोग और न्यायपालिका के प्रयासों के बावजूद इस मामले में सरकार के दृष्टिकोण से ऐसा आभास होता है कि मानो इसमें उसकी अधिक दिलचस्पी नहीं है। बलात्कार, अपहरण, हत्या और जबरन वसूली जैसे गंभीर अपराध के आरोपियों को चुनाव लडऩे के अयोग्य बनाने के मुद्दे पर सरकार ने हाल ही में शीर्ष अदालत में दलील दी कि यह विषय संसद के अधिकार क्षेत्र का है। सवाल उठता है कि आखिर इस तरह के संगीन अपराध के आरोपों में मुकदमों का सामना कर रहे व्यक्तियों के मामलों की सुनवाई समयबद्ध तरीके से पूरी क्यों नहीं की जा सकती? इसके लिये सरकार किसे जिम्मेदार ठहरायेगी? शायद न्यायपालिका को! लेकिन क्या केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों ने अपेक्षित संख्या में निचली अदालतें गठित कीं ताकि मुकदमों का तेजी से निपटारा हो सके? केन्द्र सरकार की ओर से अटार्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल ने ऐसे आरोपियों के मुकदमों की तेजी से सुनवाई के लिये त्वरित अदालतों का गठन ही एकमात्र उपाय बताया। उनका कहना था कि ऐसे मामलों में अक्सर गवाहों के आगे नहीं आने की वजह से अदालतों में आरोपियों के खिलाफ आरोप निर्धारित करने की प्रक्रिया लंबे समय तक आगे नहीं बढ़ पाती है। इसकी वजह व्हिसिल ब्लोअर्स कानून के प्रावधानों का कमजोर होना बताया जाता है। यह सही है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों से संबंधित आपराधिक मुकदमों की तेजी से सुनवाई के लिये त्वरित अदालतों की आवश्यकता है। सरकार ने न्यायालय को सूचित किया था कि 1765 निर्वाचित विधि निर्माताओं के खिलाफ 3,816 आपराधिक मुकदमें लंबित हैं। इनकी तेजी से सुनवाई के लिये उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल, बिहार, दिल्ली, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु में त्वरित अदालतें गठित की जा रही हैं। लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाहुबलियों के प्रभाव से मुक्त कराने के राजनीतिक दलों और नेताओं के तमाम दावों के बावजूद बलात्कार, हत्या, अपहरण और जबरन वसूली जैसे संगीन अपराधों के आरोपों में फंसे दागी व्यक्तियों को चुनाव लडऩे से वंचित करने के बारे में जनप्रतिनिधत्व कानून में अपेक्षित संशोधन नहीं किये जाने की वजह से यह मामला शीर्ष अदालत में आया है। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ इस पर विचार कर रही है। शीर्ष अदालत का मानना है कि वह कानून की विवेचना तो कर सकती है लेकिन कानून बनाना उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है और यह काम तो संसद को ही करना होगा।दूसरी ओर, दागी छवि वाले व्यक्तियों को चुनाव लडऩे के अयोग्य बनाने की मांग कर रहे याचिकाकर्ता की दलील है कि जब 35 से 45 प्रतिशत निर्वाचित प्रतिनिधियों पर आपराधिक मुकदमें लंबित हों तो फिर उनसे किसी कानून की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। यह भी दिलचस्प है कि बाहुबलियों और दागी छवि वाले नेताओं के संसद और विधानमंडलों में पहुंचने से चिंतित शीर्ष अदालत की संविधान पीठ ने 27 अगस्त, 2014 को एक फैसले में बलात्कार और हत्या जैसे गंभीर अपराधों तथा भ्रष्टाचार के आरोपों में अदालत में मुकदमों का सामना कर रहे व्यक्तियों को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं करने का सुझाव प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों को दिया था लेकिन ऐसा हो नहीं सका।यही नहीं, इस व्यवस्था से पहले मार्च, 2014 में न्यायालय ने सरकार से कहा था कि जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा के दायरे में आने वाले अपराधों के लिये मुकदमों का सामना कर रहे सांसदों और विधायकों के मामलों की सुनवाई यथासंभव एक साल के भीतर पूरी की जाये। शीर्ष अदालत की इतनी व्यवस्थाओं के बावजूद राजनीतिक दलों द्वारा दागी नेताओं को उम्मीदवार बनाना यही संकेत देता है कि कोई भी दल या सरकार ऐसे व्यक्तियों को सत्ता से दूर रखने की हिमायती नहीं है। इसी का ही नतीजा है कि अब इन्हें चुनाव लडऩे से वंचित करने की मांग जोर पकड़ रही है।आपराधिक छवि वाले तत्वों से संसद और विधानमंडलों को मुक्त कराने के प्रयास में ही गैर सरकारी संगठन पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन और वकील अश्वनी कुमार उपाध्याय आदि ने उच्चतम न्यायालय में याचिकायें दायर की हैं। इन याचिकाओं पर विचार करते हुए न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने आठ मार्च, 2016 को इस मामले को संविधान पीठ को सौंप दिया था। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ इस पर विचार कर रही है। गांधी जयंती से पहले ही देश को इस सवाल का जवाब मिल जाने की उम्मीद है क्योंकि प्रधान न्यायाधीश दो अक्तूबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। अपेक्षा की जाती है कि समूची व्यवस्था को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने का दावा करने वाली सरकार दागी छवि वाले नेताओं को चुनाव प्रक्रिया से बाहर रखने के लिये कोई न कोई ठोस कदम अवश्य उठायेगी।