सियासत

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ये तो सियासत है हर पैंतरे पर जिसकी सौगात होती है,
हर बात में वजह तो है पर बेवजह हरएक बात होती है,
किसी सर रूतबे का सेहरा,किसी के लश्कर का पैमाना,
क्या गुज़रती है किसी पे कैसे कहें ये कैसी जात होती है,
बेबसी तन्हाई औऱ दबिश जैसे हालात हैं मिरे मकान के,
ऊंची इन्साफ कोठी के अन्दर भी इक हवालात होती है,
तुमने तो साहिब कह दिया कि हम हैं हुक्मरान इन दिनों,
तुम्हारे दिन तो कट जाते हैं गर हमारी कैसी रात होती है,
वो वादे जो करे थे मिरी उम्र भर दर्द बांटने के खातिर,
एकबार आकर देखों फलसफों की क्या औकात होती है।
आदर्श तिवारी
लालगंज रायबरेली