सेना और सोशल मीडिया

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सैनिकों द्वारा सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर आर्मी चीफ बिपिन रावत का ताजा बयान इस मसले पर नई सोच का संकेत देता है। उन्होंने साफ-साफ कहा कि मौजूदा दौर में सैनिकों को सोशल मीडिया से दूर रखना न तो संभव है और न उचित। दरअसल हाल के दिनों में सेना के जवानों और ऑफिसरों की सोशल मीडिया पर सक्रियता के चलते सेना और सरकार दोनों को कई बार असुविधाजनक स्थितियों का सामना करना पड़ा। कुछ ही समय पहले जबलपुर में पदस्थ एक लेफ्टिनेंट कर्नल के सोशल मीडिया के जरिए आईएसआई के जाल में फंस जाने की खबर काफी चर्चित हुई। इससे पहले सेना के कई जवानों ने सोशल मीडिया पर अपनी शिकायतें सार्वजनिक की थीं जिससे ऐसा लगा कि सेना में निचले स्तर पर काफी असंतोष है। हालांकि उन मामलों में कार्रवाई का भरोसा दिया गया, लेकिन इसके बाद ऐसी खबरें आईं कि सरकार चाहती है, सेना में सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रोक लगाई जाए। आर्मी चीफ ने यह स्पष्ट कर दिया कि वे ऐसा नहीं करने जा रहे। उनका यह कहना सही है कि सोशल मीडिया हमारे दौर की एक अनिवार्यता है। सारी दुनिया इसका इस्तेमाल कर रही है। दुश्मन देश और उनकी सेनाएं भी इसका इस्तेमाल कर रही हैं। इसके जरिए अफवाह फैलाने से लेकर तमाम तरह के मनोवैज्ञानिक अभियान चलाए जा रहे हैं। यह सब दिनों-दिन बढ़ता ही जाएगा। ऐसे में अपनी सेना को सोशल मीडिया से काट कर रखना एक स्थायी कमजोरी पालना है। शिकायतें सार्वजनिक करने की समस्या से निपटने के लिए इसी काम को समर्पित एक ऐप तैयार कराने का फैसला लेकर सैन्य प्रशासन ने समस्या का आगे बढ़कर समाधान खोजने का रास्ता पकड़ा है। इस दिशा में जनरल रावत का यह बयान संतोषप्रद है कि एक सोशल मीडिया यूनिट गठित करके सेना के लोगों में न केवल इसकी अच्छी समझ विकसित की जाएगी, बल्कि मनोवैज्ञानिक तौर पर भी उन्हें इतना सक्षम बनाया जाएगा कि वे दुश्मन तत्वों की चालें पहचान सकें। सैन्य प्रशासन की ओर से उठाए गए ये कदम देश के बाकी दायरों को भी यह सबक देते हैं कि नई समस्याओं के नए समाधान ही खोजे जाने चाहिए।